सब मारे जाएँगे
"सब मारे जाएँगे" एक विचारोत्तेजक हिंदी कविता है जो समाज, सत्ता, अन्याय और मानवीय अस्तित्व के गहरे प्रश्नों को उठाती है।
कविता
उज्जवल कुमार सिंह
6/23/2026
आज नहीं तो कल सब मारे जाएँगे,
जो बचे हैं हादिसों में मारे जाएँगे।
आदमी की हैसियत कुछ भी नहीं इस मुल्क में,
बस किसी आँकड़ें में ही मारे जाएँगे।
लब हिलाना भी यहाँ ख़तरे से ख़ाली कब रहा,
कुछ अगर सच बोल दें तो मारे जाएँगे।
ख़ौफ़ का ऐसा धुआँ फैला हुआ है हर तरफ़,
लोग अपने घर में भी मारे जाएँगे।
कौन सुनता है यहाँ फ़रियाद अहले-दर्द की,
चीख़ते रह जाएँगे या मारे जाएँगे।
दौर-ए-हाज़िर की यही शायद सियाही है जनाब,
ज़िंदा रहकर भी कई मारे जाएँगे।
नाम है ‘उज्ज्वल’, इस दौर में रहना ज़रा संभल के,
चमकने वाले अक्सर ही अँधेरों में मारे जाएँगे।
